लखनऊ के अलीगंज इलाक़े में तीन मंजिला व्यावसायिक इमारत में सोमवार 22 जून को भीषण आग लगी, जिसमें कम से कम 15 लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में ज्यादातर बच्चे और छात्र शामिल हैं। कई लोग इस दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल भी हुए हैं। कुछ पीड़ितों ने आग और धुएं से बचने के लिए खुद को वॉशरूम के अंदर बंद कर लिया था, लेकिन वे सभी मृत पाए गए।
जैसा कि इस तरह के सारे मामलों में होता है, इस बार भी सरकार ने मुआवजे का ऐलान करने में देरी नहीं की और उच्च स्तरीय जांच के आदेश भी दिए हैं। सरकार जानती है कि उच्च स्तरीय जैसा शब्द दर्दनिवारक दवा की तरह काम करता है। जिसे खाने के थोड़ी देर बाद दर्द का अहसास जाने लगता है और मरीज इस बात पर ध्यान नहीं देता कि दर्द की वजह जस की तस रहती है। दर्द सही इलाज के बाद ही खत्म हो सकता है। इसी तरह ऐसी दुर्घटनाओं पर रोक भी तभी लग पाएगी, जब सही और कड़े फैसले उचित वक्त पर लिए जाएं। सरकार कड़े फैसले तो नहीं ले रही, लेकिन सही तरह से खबरों को जरूर प्रसारित-प्रचारित करवा रही है।
जैसे कल दोपहर में लगी आग के बाद मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने अपने सारे कार्यक्रम टाल कर इस घटना पर ध्यान दिया, अधिकारियों को तलब किया, कुछ लोगों पर कार्रवाई हुई है, कुछ आरोपियों को पकड़ा गया है, फोरेंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंच गई है, घटना के कारणों की पड़ताल हो रही है, ऐसी तमाम खबरें इस तरह आ रही हैं मानो सरकार का प्रचार होगा तो मरे हुए लोगों में फिर से जान फूंकी जा सकेगी। कुछ वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी से पीड़ितों के परिजन अपना दर्द बता रहे हैं, लेकिन बदले में मुख्यमंत्री क्या कह रहे हैं, वह हिस्सा म्यूट कर दिया गया है। एक चुने हुए नेता की बातों को जनता तक न पहुंचने देने के पीछे क्या कारण है, यह विचारणीय है।
बहरहाल, लखनऊ की घटना से इसी महीने 3 जून को दिल्ली के होटल में लगी आग की भयावह घटना के जख्म फिर ताजा हो गए। दिल्ली की घटना में अवैध तरीके से निर्माण और आग रोकने के उपायों को नजरंदाज करने के कारण सामने आए थे। अब लखनऊ प्रकरण में भी शायद ऐसी ही बातें सुनने मिलें। बताया जा रहा है कि इमारत वीरेंद्र शुक्ला के नाम पर है। उनका बेटा अखिलेश शुक्ला इस बिल्डिंग में ग्राफिक्स सेंटर चला रहा था। घटना के बाद से पिता और पुत्र दोनों फरार बताए जा रहे हैं। चश्मदीदों का आरोप है कि आग लगने के बाद दमकल विभाग की टीम को पहुंचने में काफी देरी हुई, जिससे अफरा-तफरी मच गई और जान-माल का अधिक नुकसान हुआ। सरकार ने अभी जो उच्च स्तरीय जांच के आदेश दे दिए गए हैं, उसमें यह देखा जाएगा कि इमारत में अग्निशमन उपकरण थे या नहीं, सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा था या नहीं। लेकिन इस तरह की कवायद हास्यास्पद ही लगती है। मान लें कि जांच में पता चलता है कि इमारत में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा था, तो इस जानकारी के बाद क्या बदल जाएगा। जिन लोगों ने इस आपराधिक लापरवाही का खामियाजा भुगता, उनके साथ तो इंसाफ फिर भी नहीं होगा। कायदे से तो सरकार को ऐसी घटनाओं से सबक लेते हुए तमाम इमारतों की जांच-पड़ताल करनी चाहिए। अभी उत्तरप्रदेश के ही नोएडा में दो अलग-अलग बहुमंजिला रिहायशी इमारतों में आग लगी। जिस पर काबू पाने में काफी तकलीफ हुई, क्योंकि आग ऊपर की मंजिलों पर लगी थी, जहां तक फायरब्रिगेड की पानी की बौछार नहीं पड़ रही थी।
गनीमत रही कि इन दुर्घटनाओं में किसी की जान नहीं गई। इसलिए सरकार अगर वाकई काम करते हुए दिखाना चाहती है तो उसे बिल्डरों और भू माफिया के दबाव में आए बिना अधिकारियों को ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए कहना चाहिए और खुद भी यही मिसाल कायम करनी चाहिए। निचले स्तर के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों को दुर्घटनाओं के बाद निलंबित करने को कार्रवाई नहीं कहा जा सकता। असली कार्रवाई तो तब होगी जब हरेक इमारत में आग से बचाव की सारी तैयारी देखने के बाद ही अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी किया जाए, यानी अग्निशमन यंत्र से लेकर आपातकालीन निकास द्वार जैसी हरेक व्यवस्था को बारीकी से परख कर ही इमारत में लोगों को रहने या काम करने की अनुमति दी जाए और जो इसका पालन न करे, उस पर सख्त कार्रवाई हो। इसके अलावा आग से बचाव का और कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
29 साल पहले 13 जून 1997 को दिल्ली के उपहार सिनेमा घर में इसी तरह आग लगी थी, जिसमें 59 लोग मारे गए थे, तब भी ऐसे ही कारण सामने आए थे कि सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया था। उस मामले में अभी कुछ वक्त पहले ही सिनेमा घर के मालिक अंसल बंधुओं को सजा हुई। पीड़ितों के परिजनों ने अपने खोए हुए प्रियजनों को इंसाफ दिलाने के लिए एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। क्या इस सिलसिले को समाज को आगे बढ़ाना है या अब सरकारों को उनकी जिम्मेदारी का अहसास कराने का वक्त आ गया है। कोई मुख्यमंत्री हो या मंत्री हो या कितना भी बड़ा अधिकारी हो, उस कुर्सी पर बैठने का मतलब ही यही है कि उन्हें जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को निभाना है। वहां उन्हें अपने प्रचार की खबरें दिखाने के लिए नहीं बिठाया गया है।