नई दिल्ली: हिमालयी क्षेत्र पर दिल्ली में श्वेत पत्र जारी करने के मौके पर अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने सोमवार को कहा कि हिमालयी परियोजनाएं अब केवल जरूरी ही नहीं बल्कि अब मजबूरी बन गई है।
इस मौके पर आयोजक व निदेशक दीक्षु सी कुकरेजा की मौजूदगी में अरुणाचल प्रदेश की पर्वतीय जल परियोजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि योजनाएं देश की रक्षा और सैन्य जरूरतों के हिसाब से बन रही है।
पड़ोसी चीन की गतिविधियों का हवाला देते हुए खांडू ने कहा कि इसे रोका नहीं जा सकता लेकिन श्वेत पत्र की सिफारिशों में से कुछ पर अमल जरूर किया जा सकता है।
उन्होंने नीति निर्माण के समय सभी हिमालयी राज्यों को एक मंच पर लाने के लिए नीति आयोग का आह्वान किया। उन्होंने कहा-‘हिमालयी क्षेत्र के विकास के लिए वैज्ञानिक आकलन, जिम्मेदार योजना, सतत अवसंरचना, सामुदायिक भागीदारी और मजबूत नीतिगत समन्वय को एकीकृत ढांचे में शामिल करना होगा। बता दें कि श्वेत पत्र की सिफारिशों में जिन मुद्दों को शामिल किया गया है उनमें जल विधुत परियोजनाओं की जगह, भूटान की तरह इसमें एक हिस्सा सौर विधुत योजनाओं का रखने, नीति निर्माण में स्थानीय लोगों को शामिल करने, डाटा विश्लेषणऔर कृत्रिम बुद्दिमता का उपयोग करने, आदि की सिफारिशें शामिल हैं।
एक सवाल के जवाब में खांडू ने कहा कि ‘सियांग और अपर सियांग ज़िलों में प्रस्तावित अपर सियांग बहुउद्देश्यीय परियोजना (एसयूएमपी) को 75 फीसद लोगों का समर्थन मिल चुका है। शेष लोगों से बात-चीत जारी है। बता दें कि यह सियांग नदी प्रस्तावित लगभग 12,000 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना है। जिसे चीन द्वारा सियांग पर एक विशाल बांध (66 गीगावाट) के निर्माण के ‘काट’ के तौर पर बनाया जाना है।
क्या कहती है रपट : अनिल वाधवा, प्रदीप सांगवान, नर बहादुर खातीवोरा, वीरेंद्र कुमार पॉल, शिक्षा स्वरूपा कर और मिली मजूमदार की यह रिपोर्ट हिमालय में प्रचलित विकास मॉडल पर पुनर्विचार की आवश्यकता को रेखांकित करती है। इसमें परियोजना-आधारित विकास से हटकर समग्र और प्रणालीगत योजना अपनाने, जलग्रहण क्षेत्र आधारित रणनीतियों को लागू करने, नीति-निर्माण में वैज्ञानिक आंकड़ों को शामिल करने तथा भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप अवसंरचना विकसित करने पर जोर दिया गया है। साथ ही, पारिस्थितिक वहन क्षमता को एक अनिवार्य और अटूट मानक के रूप में स्वीकार करने की आवश्यकता भी रेखांकित की गई है।