नई दिल्ली: लोकसभा में 13 मार्च को पेश किए गए ट्रांसजेंडर (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026 के मसविदे को लेकर उभयलिंगी (एलजीबीटीक्यू) समुदाय में आक्रोश है। उन्होंने इस प्रस्तावित विधेयक को प्रतिगामी बताते हुए तत्काल वापस लेने की मांग की है। प्रेस वार्ता में इस समुदाय से जुड़े लोगों व सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि यह विधेयक 2014 के ‘नालसा फैसला’ का उल्लंघन है। यह ‘स्व-घोषित लैंगिक पहचान’ के अधिकार को खत्म कर देगा। उन्होंने कहा कि नया कानून यह तय करने के लिए एक संकीर्ण और सीमित परिभाषा प्रस्तावित करता है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति किसे माना जाएगा।
प्रस्तावित विधेयक केवल तीन समुदाय यानि हिजड़ा, किन्नर, अरावणी या जोगती से जुड़े लोगों को ही ट्रांसजेंडर मानेगा। इसके अलावा अगर किसी को ट्रांसजेंडर की श्रेणी घोषित करना है तो उसके पहचान के लिए अब मेडिकल बोर्ड या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा परीक्षण अनिवार्य हो सकती है। विधेयक का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि जिससे नौकरशाही और चिकित्सा हस्तक्षेप बढ़ेगा। उनका कहना है कि कि यह विधेयक इंटरसेक्स भिन्नताओं वाले व्यक्तियों की विशिष्ट जरूरतों को संबोधित करने के बजाय उन्हें केवल ‘ट्रांसजेंडर अंब्रेला’ के तहत समेटता है क्योंकि खुद को कानूनी रूप से ट्रांसजेंडर साबित करने के लिए उभयलिंगी समुदाय के बाकी लोगों को हिजड़ा, किन्नर, अरावणी या जोगती समुदाय से जुड़ना अनिवार्य हो जाएगा। दूसरी ओर ट्रांसजेंडर घोषित होने के सरकारी प्रावधान ‘अनिवार्य चिकित्सा प्रमाणन प्रक्रिया’ को उन्होंने निजता और गरिमा के मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताते हुए और इसे वापस लेने की मांग की।