देहरादून 08 फरवरी। अनेक लोग हरे भरे पेड़ों पर कील ठोक कर प्रचार सामग्री, लाईट, बैनर टाग देते हैं, जिसके कारण पेड़ों की ग्रोथ रुक जाती हैं और वो कुछ ही दिनों में सुख जाते हैं। हरे भरे पेड़ों पर कील ठोकने पर पाबंदी होनी चाहिए, ताकी पेड़ों को बचा कर पर्यावरण की रक्षा हो सके। हरे पेड़ों पर कील ठोकना, विज्ञापन या पोस्टर लगाने के लिए कीलें ठोकना ट्री प्रोटेक्शन एक्ट और वन अधिनियम के तहत एक दंडनीय और गैरकानूनी अपराध है। दोषी पाए जाने पर जुर्माना (जैसे 5000-25,000 रुपये तक) हो सकता है।
इस तरह की गतिविधि से पेड़ों के ऊतक (कैम्बियम परत) क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, जिससे पेड़ सूख सकते हैं, बीमार पड़ सकते हैं, और उनका विकास रुक सकता है। इस पर सख्त पाबंदी है और नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना या दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है। कीलें पेड़ की छाल में छेद करती हैं, जो कवक (फंगस) और बीमारियों के लिए प्रवेश द्वार खोलती हैं। समय के साथ पेड़ के ऊतक सड़ने लगते हैं और पेड़ धीरे-धीरे सूख जाता है। पेड़ों को नुकसान से बचाने के लिए उन पर पोस्टर, बैनर, या हैलोजन लाइटें टांगने पर प्रतिबंध लगाया जाना जरूरी है।
आज भी देहरादून में अनेक स्थानों पर ऐसे पेड़ देखे जा सकते हैं जिन पर किल का उपयोग हो रखा हैं। पर्यावरण प्रेमियों द्वारा ‘कील-मुक्त पेड़ अभियान’ चलाकर पोस्टर हटाने और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की जाती रहीं है। मगर शासन प्रशासन द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई। हाईकोर्ट ने पेड़ों पर किसी भी प्रकार की कील ठोकने तथा तार बाड़ करना प्रतिबंधित करने के बाद भी हरे भरे पेड़ों को जख्म देने का सिलसिला बरकरार है। लोग प्रचार सामग्री टांग कर नियमों का खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। बावजूद विभागीय अधिकारियों को पेड़ों पर लगे बड़े-बड़े बोर्ड नहीं दिख रहे, जिससे पेड़ सूखने के कगार तक पहुंच गए है।