देहरादून : ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (Rarest of Rare) सिद्धांत भारतीय न्याय पालिका द्वारा मृत्युदंड देने के लिए अपनाया गया एक बेहद सख्त कानूनी मापदंड है। बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) फैसले से जन्मा यह नियम कहता है कि फांसी केवल उन अत्यधिक नृशंस, क्रूर या असाधारण मामलों में दी जानी चाहिए, जो समाज की अंतरात्मा को झकझोर दें। सर्वोच्च न्यायालय ने 1980 में इसे परिभाषित किया, जहाँ उम्रकैद नियम है और फांसी अपवाद।
रेयरेस्ट ऑफ रेयर की परिभाषा :- जहां तक रेयरेस्ट ऑफ रेयर की बात है तो साल था 1980. जब देश की सर्वोच्च अदालत में रेयरेस्ट ऑफ रेयर टर्म का पहली बार इस्तेमाल हुआ था। ये मामला बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य था। इसी मामले के बाद तय हुआ कि उम्रकैद की सजा एक नियम होगी। जबकि फांसी अपवाद के तौर पर केवल बेहद संगीन मामलों ही में दी जाएगी। बाद में, साल 1983 में मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य केस में इसको लेकर कुछ और चीजें तय हुईं। वैसे तो रेयरेस्ट ऑफ रेयर की कानूनन कोई एक निर्धारित परिभाषा नहीं है। फिर भी अगर बहुत थोड़े में अगर कहें तो ये किसी खास मामले के फैक्ट्स – तथ्य, सिचुएशन–परिस्थिति, जो अपराध हुई है–उसकी क्रूरता, अपराधी के आचरण, और उसके पुराने रिकॉर्ड्स के आधार पर तय किया जाता है कि इसको रेयरेस्ट ऑफ रेयर कहा जा सकता है या नहीं। मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य केस में तय हुआ था कि गंभीरतम मामलों को छोड़कर और किसी मामले में फांसी की सजा नहीं दी जानी चाहिए। साथ ही, फांसी की सजा तभी दी जानी चाहिए जब अपराध को देखते हुए आजीवन कारावास कम लगे।