देहरादून। डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने जानकारी देते हुये बताया की प्रति वर्ष माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर वसंत पंचमी का पर्व मनाया जाता है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, यह पंचमी माता सरस्वती को समर्पित है। पंचांग के अनुसार, माघ शुक्ल पंचमी तिथि 23 जनवरी 2026 (शुक्रवार) को रात 02:28 बजे शुरू होगी और 24 जनवरी 2026 (शनिवार) को रात 01:46 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर वसंत पंचमी 23 जनवरी 2026 शुक्रवार को मनाई जाएगी। वसंत पंचमी पर पूजन का शुभ मुहूर्त प्रातः काल 6 बजकर 57 मिनट से दोपहर 12 बजकर 21 मिनट तक रहेगा। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता की उत्पत्ति का उद्देश्य इस ब्रह्माण्ड को वाणी और ज्ञान देना था।
कहते हैं जिनकी जिव्हा पर सरस्वती देवी का वास होता है, वे ज्ञान और विद्या के धनी होते हैं। इनके बिना एक मनुष्य का जीवन अंधकारमय होता है। वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती पूजन और व्रत करने से वाणी मधुर होती है, स्मरण शक्ति तीव्र होती है और विद्या में कुशलता प्राप्त होती है। वसंत का सीधा सा अर्थ है सौन्दर्य, शब्द का सौन्दर्य, वाणी का सौंदर्य, प्रकृति का सौंदर्य, प्रवृत्ति का सौंदर्य, वसंत पंचमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, बुद्धि और नए आरंभ का दिव्य संकेत है। वसंत के पर्व का विस्तार अधिक है क्योंकि इससे और भी बहुत से सकारात्मक तत्व जुड़े हैं। मां सरस्वती वाणी एवं ज्ञान की देवी है। ज्ञान को संसार में सभी चीजों से श्रेष्ठ कहा गया है, इस आधार पर देवी सरस्वती सभी से श्रेष्ठ हैं. कहा जाता है कि जहां सरस्वती का वास होता है वहां लक्ष्मी एवं काली माता भी विराजमान रहती हैं। इसका प्रमाण है माता वैष्णो का दरबार जहॉ माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी, माँ काली ये तीनों महाशक्तियां साथ में निवास करती हैं।
जिस प्रकार माता दुर्गा की पूजा का नवरात्रे में महत्व है उसी प्रकार वसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजन का महत्व है। सरस्वती पूजा के दिन यानी माघ शुक्ल पंचमी के दिन सभी शिक्षण संस्थानों में शिक्षक एवं छात्रगण सरस्वती माता की पूजा एवं अर्चना करते हैं। सरस्वती माता कला की भी देवी मानी जाती हैं अत: कला क्षेत्र से जुड़े लोग भी माता सरस्वती की विधिवत पूजा करते हैं. छात्रगण सरस्वती माता के साथ-साथ पुस्तक, कापी एवं कलम की पूजा करते हैं। संगीतकार वाद्ययंत्रों की, चित्रकार अपनी तूलिका की पूजा करते हैं। ग्रंथों के अनुसार वसंत पंचमी पर पीला रंग के उपयोग का महत्व है। क्योंकि इस पर्व के बाद शुरू होने वाली वसंत ऋतु में फसलें पकने लगती हैं और पीले फूल भी खिलने लगते हैं। इसलिए वसंत पंचमी पर्व पर पीले रंग के कपड़े और पीला भोजन करने का बहुत ही महत्व है।
इस त्योहार पर पीले रंग का महत्व इसलिए बताया गया है क्योंकि वसंत का पीला रंग समृद्धि, ऊर्जा, प्रकाश और आशावाद का प्रतीक है। इसलिए इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनते हैं, व्यंजन बनाते हैं। सृष्टि की रचना के समय ब्रह्माजी ने महसूस किया कि जीवों की सर्जन के बाद भी चारों ओर मौन छाया रहता है। उन्होंने विष्णुजी से अनुमति लेकर अपने कमंडल से जल छिड़का, जिससे पृथ्वी पर एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। छह भुजाओं वाली इस शक्ति रूप स्त्री के एक हाथ में पुस्तक, दूसरे में पुष्प, तीसरे और चौथे हाथ में कमंडल और बाकी के दो हाथों में वीणा और माला थी।
ब्रह्माजी ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, चारों ओर ज्ञान और उत्सव का वातावरण फैल गया, वेदमंत्र गूंज उठे। ऋषियों की अंतःचेतना उन स्वरों को सुनकर झूम उठी। ज्ञान की जो लहरियां व्याप्त हुईं, उन्हें ऋषिचेतना ने संचित कर लिया।तब से इसी दिन को वसंत पंचमी के रूप में मनाया जाता है। माता शारदा के पूजन के लिये भी वसंत पंचमी का दिन विशेष शुभ रहता है. इस दिन 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को पीले-मीठे चावलों का भोजन कराया जाता है तथा उनकी पूजा की जाती है। मां शारदा और कन्याओं का पूजन करने के बाद पीले रंग के वस्त्र और आभूषण कुमारी कन्याओ, निर्धनों व विप्रों को देने से परिवार में ज्ञान, कला व सुख -शान्ति की वृ्द्धि होती है. इसके अतिरिक्त इस दिन पीले फूलों से शिवलिंग की पूजा करना भी विशेष शुभ माना जाता है।
बसंत पंचमी का दिन कला और ज्ञान की देवी सरस्वती को समर्पित माना जाता है। इस दिन माता सरस्वती की विशेष रूप से पूजा की जाती है। वहीं, इस बार बसंत पंचमी बेहद खास रहने वाली है क्योंकि इस शुभ अवसर पर बेहद दुर्लभ संयोग बन रहा है। इस दिन चंद्रमा का गोचर मीन राशि में होगा। साथ ही, चंद्रमा से चतुर्थ भाव में गुरु रहेंगे।
ऐसे में बसंत पंचमी के दिन बेहद शुभ संयोग बन रहा है। यह तिथि छात्रों के लिए भी उत्तम संयोग बना रही है। इस त्योहार के साथ ही बसंत ऋतु का आगमन भी माना जाता है।
डॉक्टर आचार्य सुशांत राज ने जानकारी देते हुये बताया की पंचांग के अनुसार, माघ शुक्ल पंचमी तिथि की शुरुआत 22 जनवरी, गुरुवार के दिन रात में 2 बजकर 29 मिनट से होगी और इसका समापन 23 जनवरी, शुक्रवार को रात में 1 बजकर 47 मिनट पर होगा। ऐसे में शास्त्रों के अनुसार, बसंत पंचमी 23 तारीख को मनाई जाएगी और इसी दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाएगी। ऐसा करने से जातक के ज्ञान, कला और बुद्धि में वृद्धि होती है। साथ ही, माता सरस्वती की कृपा प्राप्त हो सकती है। 23 जनवरी, शुक्रवार के दिन यानी बसंत पंचमी पर चंद्रमा का गोचर मीन राशि में होने जा रहा है। वहीं, चंद्रमा से चतुर्थ भाव में गुरु के होने से गजकेसरी का शुभ संयोग बन रहा है। ज्ञान के कारक गुरु की राशि में बैठकर चंद्रमा का गजकेसरी योग बनाना अत्यंत शुभ है। यह छात्रों के लिए उत्तम संयोग बना रहा है। बसंत पंचमी पर सुबह 8 बजकर 33 मिनट से लेकर 11 बजकर 13 मिनट का समय शिक्षा आरंभ के लिए सबसे उत्तम रहेगा। बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा करने के लिए सुबह 9 बजकर 53 मिनट से लेकर 11 बजकर 13 मिनट तक का समय सबसे उत्तम रहेगा। इस दिन लोग अपने घर, कॉलेज, स्कूल और कार्यस्थल पर देवी सरस्वती की विधि-विधान से पूजा करते हैं। साथ ही, माता से ज्ञान प्राप्ति की कामना करते हैं। पूजा के दौरान देवी सरस्वती को सिंदूर, श्रृंगार आदि की वस्तुएं भी अर्पित की जाती हैं। और गुलाल चढ़ाया जाता है। इसी दिन से बसंत ऋतु को आरंभ हो जाता है।
लाभ चौघड़िया : 8 बजकर 33 मिनट से लेकर 9 बजकर 53 मिनट तक।
अमृत चौघड़िया : 9 बजकर 53 मिनट से लेकर 11 बजकर 53 मिनट तक।