ढहते हुए सामंतवाद और मध्यमवर्ग के उदय की दास्तान
नई दिल्ली। छोटी बहू (मीना कुमारी) अपने पति को घर पर ही रोकने के लिए हर तरह का जतन करती है। व्रत-उपवास से लेकर भूतनाथ (गुरुदत्त) से कथित जादुई सिन्दूर तक मंगवाती है। यहाँ तक की कुलीन महिलाओं के लिए वर्जित शराब भी अपने पति के कहने पर पीना शुरू कर देती है। पर पतनशील सामंती परंपरा में पले-बढे छोटे बाबू (रहमान) को लगता है कि चौधरी खानदान का मर्द अगर रात अपने घर पर गुजारे तो उसके मर्द होने पर लानत है। पत्नी को हतोत्साहित करने के लिए वो उससे कहते हैं कि क्या वह बाजारू औरत की तरह मदिरा पीकर और पिलाकर उनका मनोरंजन कर सकती है? चौधरी खानदान की महिलाओं में चल रही रीति से हटकर छोटी बहू अपने पति को हर तरह का जतन करके घर पर रोकने के लिए कृतसंकल्प है। छोटे बाबू कुछ दिन घर पर रुकते भी हैं, पर आज शाम वे कोठे पर जाने के लिए तैयार हो रहे हैं, पर छोटी बहू उन्हें कम से कम आज रात के लिए रुक जाने के लिए उनसे मनुहार कर रही है।
पर छोटे बाबू अंत में लड़ाई करके छोटी बहू को छोड़कर कोठे पर जाने के लिए निकल पड़ते हैं। छोटी बहू शराब के बोतल के साथ अकेली रह जाती है। ऊपर का दृश्य मेरी पसंदीदा फिल्मों में से एक गुरुदत्त की कालजयी ”साहब, बीवी और गुलाम” का दृश्य है। ये दृश्य इस बात को दिखाता है कि पतनशील सामंती समाज के कुलीन मर्दों के रग-रग अय्याशी समा चुकी थी और महिलाएं उस समाज में प्यार विहीन अकेलेपन को झेलने के लिए अभिशप्त थी. कालांतर में इसी अय्याशी ने सामंती समाज को खोखला कर दिया जिसके चलते उस समाज का पतन हो जाता है। पर साथ ही फिल्म इसी के समांतर गुलाम भूतनाथ और उसकी पत्नी जबा के रूप में मध्यम वर्ग के उदय को भी दिखलाता है।
ये फिल्म मेरे प्रिय उपन्यासकार विमलमित्र की इसी नाम से कालजयी उपन्यास ” साहिब, बीवी ओ गोलाम” का फ़िल्मी परदे पर चित्रण है। पलासी की लड़ाई से लेकर बीसवीं सदी में 60 के दशक तक के इतिहास को औपन्यासिक रूप में ढालने के लिए उन्होंने 5 उपन्यास लिखे – ”बेगम मेरी विश्वास”, ”साहब बीवी और गुलाम ”,”खरीदी कौड़ियों के मोल”, ”इकाई, दहाई, सैकड़ा” और ” चलो कलकत्ता”। इसमें ”साहब, बीवी और गुलाम” में उन्होंने 19 वीं सदी के अंतिम दशक से लेकर प्रथम विश्व युद्ध से पहले तक के समय का चित्रण किया है। हिंदी में इस पर फिल्म बनाने से पहले 1956 में इस उपन्यास पर बांग्ला में फिल्म बन चुकी थी जिसके नायक उत्तम कुमार थे. इस उपन्यास पर एक नाटक भी बन चुका था। इस फिल्म के निर्माता गुरुदत्त, जिन्हें बंगाली संस्कृति और साहित्य से बेहद लगाव था, इस उपन्यास को पढ़कर इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने इस पर हिंदी में फिल्म बनाने का निश्चय कर लिया। जब उन्हें पता चला की इस किताब पर बांगला में पहले फिल्म बन चुकी है तो उन्होंने वो फिल्म भी देखी। इसके बाद उन्होंने कोलकाता स्थित अपने एजेंट के माध्यम से से विमल मित्र से संपर्क स्थापित किया और उन्हें बम्बई आने का आग्रह किया ताकि इस उपन्यास के अधिकार प्राप्त करने पर चर्चा की जा सके। ख़राब स्वास्थ्य के चलते विमल मित्र उतनी दूर यात्रा नहीं करना चाहते थे तो गुरुदत्त ने उनके लिए हवाई जहाज से सफ़र का इंतजाम कराया. अन्तोगत्वा विमल मित्र 1960 के शुरुआती महीने में बम्बई आ गए।
गुरुदत्त से मुलाकात के बाद वे उनके बंगला भाषा और साहित्य के ज्ञान से बेहद प्रभावित हुए। उन्हें लगा कि गुरुदत्त उपन्यास के फिल्मांकन के समय इसकी मूल आत्मा से छेड़-छाड़ नहीं करेंगें। उन्होंने अपने उपन्यास पर फिल्म बनाने के अधिकार गुरुदत्त को दे दिए. पर गुरु इतने पर ही कहाँ मानने वाले थे। उन्होंने विमल मित्र को पटकथा लिखने के लिए भी राजी कर लिया और लोनावाला के उनके बंगले में विमल मित्र और अबरार अल्वी ने मिलकर पटकथा लेखन को पूरा किया। चूंकि 700 पन्नों के उपन्यास को हूबहू सिनेमा के पर्दे पर चित्रित नहीं किया जा सकता था, इसलिए मूलकथा को सिनेमाई दृष्टिकोण से संक्षिप्त किया गया जिसमें विमल मित्र को कोई आपत्ति नहीं थी। बहुत सारे ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, ब्राह्मो समाज के कार्यकलाप, स्वामी विवेकानंद की वापसी इत्यादि प्रसंग हटा दिए गए। इस फिल्म के किरदारों में सबसे प्रमुख छोटी बहू की भूमिका के लिए गुरुदत्त की पहली पसंद लंदन में रहने वाली छाया आर्य थी। वे लन्दन से भारत आ भी गयी, पर शुरुआती कुछ दृश्यों को देखने के बाद छोटी बहू की संवेदनशीलता को उनके चेहरे पर नहीं पाकर गुरुदत्त ने किसी दूसरे कलाकार को लेने का निश्चय किया. ऐसे में अबरार अल्वी ने मीना कुमारी का नाम सुझाया. गुरु फ़ौरन मान गए पर इस रोल के लिए उनके पति कमाल अमरोही से बात करने का जिम्मा उन्होंने अबरार अल्वी को ही सौंपा क्योंकि वे उन्हें अच्छी तरह से जानते थे. कमाल अमरोही हालांकि कुछ ना नुकर कर रहे थे पर अबरार अल्वी के मुंह से कहानी सुनकर मीना कुमारी किसी भी कीमत पर छोटी बहू का रोल करना चाहती थी, इसलिए कमाल अमरोही के पास हाँ कहने के अलावा कोई चारा नहीं रहा. भूतनाथ के रोल के लिए पहले अभिनेता विश्वजीत से बात की गयी, पर बात बनी नहीं. फिर शशि कपूर से संपर्क स्थापित किया गया. शशि कपूर तैयार थे पर एकमुश्त डेट उनके पास नहीं थी. इसके अलावा पहले ही दिन गुरु से मिलने वो 3 घंटे देरी से पहुंचे. इससे गुरुदत्त उखड़ गए. अंत में उस भूमिका को अबरार अल्वी के कहने पर गुरुदत्त ने खुद ही करने का निश्चय किया. जबा की भूमिका गुरुदत्त शुरू से ही वहीदा रहमान को देना चाहते थे, पर वहीदा रहमान छोटी बहू की भूमिका निभाने पर जोर दे रही थी.
पर गुरुदत्त को लगता था कि छोटी बहू की भूमिका निभाने के लिए उनकी उम्र कम है. अंत में वहीदा रहमान जबा की भूमिका निभाने के लिए मान गयी. छोटे बाबू की भूमिका के लिए गुरुदत्त की फिल्मों के नियमित कलाकार रहमान को लिया गया तो मंझले बाबू की भूमिका के लिए सप्रू को. बंशी का रोल धूमल के हिस्से आया. गुरु की हर फिल्म में नजर आने वाले जॉनी वॉकर, जिसे की गुरु लकी चार्म मानते थे, के लिए कोई भूमिका नहीं बन पायी, क्योंकि फिल्म एक पीरियड फिल्म थी जिसमें हलके-फुल्के हास्य के लिए कोई जगह नहीं बन पायी. ”कागज के फूल” की असफलता के बाद गुरुदत्त खुद निर्देशन नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अपने पटकथा लेखक अबरार अल्वी को ये दायित्व सौंपा.फिल्म की शूटिंग 1 जनवरी 1961 को प्रारम्भ हुई. जब तक कोलकाता के बगल में स्थित भवानीपुर में एक लगभग खंडहर हो चुकी हवेली का जीर्णोद्धार करके चौधरी खानदान की हवेली की शक्ल दी जा रही थी, मुंबई के स्टूडियो में जबा और भूतनाथ वाले हिस्से को फिल्मा लिया गया. हवेली की जीर्णोद्धार के बाद बाकी हिस्से की शूटिंग भी तेजी से प्रारम्भ हो गयी और साल के अंत होते होते लगभग पूरी फिल्म की शूटिंग पूरी कर ली गयी. फिल्म की कहानी फ़्लैश बैक में चलती है. ओवरसियर भूतनाथ ( गुरुदत्त) की देख-रेख में एक खंडहरनुमा हवेली को गिराया जा रहा है ताकि कोलकाता में तेजी से बढ़ रही यातायात की समस्या से निपटने के लिए हवेली से सामने से निकल रही सडक को चौड़ी किया जा सके. भूतनाथ को याद आता है कि ये वही हवेली है जहाँ वो कलकत्ता में पहली बार आने पर अपनी एक मुंहबोली बहन के पति के कमरे में ठहरा था. उसकी आँखों के सामने उस समय शान से सजी-धजी हवेली का दृश्य उभर जाता है और याद आते हैं इसमें रहने वाले मंझले बाबू, छोटे बाबू, नन्हे बाबू, घडी बाबू, वंशी, उसकी बहन, बड़ी बहू, मंझली बहू और छोटी बहू. जल्दी अपने बहनोई की सिफारिश से भूतनाथ की नौकरी मोहिनी सिन्दूर फैक्ट्री में हो जाती है.
इसके कर्ता-धर्ता सुबिनय बाबू ( नजीर हुसैन) हैं, जो ब्राह्मो समाज के सदस्य हैं. वहीं भूतनाथ की मुलाकात उनकी लड़की जबा ( वहीदा रहमान) से होती है. थोड़ी नोंक-झोंक के बाद दोनों एक-दुसरे को प्यार करने लग जाते हैं. खासकर जब भूतनाथ घायल हो जाता है और जबा उसकी देखभाल करती है. उधर हवेली में भूतनाथ की पहचान वंशी से हो जाती है, जो छोटे मालिक का नौकर है. एक रात बंसी भूतनाथ को छोटे जमींदार की पत्नी छोटी बहू(मीना कुमारी) से मिलाने के लिए ले जाता है, जो उससे अपने लिए मोहिनी सिंदूर लाने के लिए कहती है ताकि वो अपने अय्याश पति यानि छोटे बाबू (रहमान)को अपने वश में कर सके. भूतनाथ उनके दुःख से आहत हो जाता है और अनजाने में उनका गुप्त विश्वासपात्र बन जाता है. जब छोटी बहू द्वारा अपने पति को मनाने की बार-बार कोशिशें विफल हो जाती हैं, तो वह उसे अपने साथ रखने के लिए उसकी शराब पीने वाली साथी बन जाती है. उधर सुबिनय बाबू ने मोहिनी सिन्दूर फैक्ट्री बंद कर देते हैं और शेष जीवन ब्रहमो समाज के कार्य में लगा देना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि मोहिनी सिन्दूर ने नाम पर वो लोगों के साथ धोखाधड़ी कर रहे हैं. उन्होंने जबा की शादी समाज के ही एक सदस्य सुपवित्र तय कर दी है. निराश भूतनाथ को सुबिनय बाबू की मदद से ही एक रोड कंस्ट्रक्शन कंपनी में नौकरी मिल जाती है और वह प्रशिक्षण के लिए बाहर चला जाता है. लेकिन उसके पिता की मृत्यु के बाद जबा को उनके पेटी में मिले अपनी दादी के ख़त से पता चलता है कि उसकी शादी बचपन में ही किन्हीं अमूल्य चक्रवर्ती से हो गयी है और ये जानकार वो अब सुपवित्र से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती है. जब भूतनाथ वापस आता है तो देखता है कि हवेली आंशिक रूप से बर्बाद हो चुकी है.
छोटी बहू अब एक हताश शराबी है और उसका पति लकवाग्रस्त है. इस बीच, भूतनाथ को जब जबा से उस ख़त के बारे में पता चला तो समझ गया कि उसकी और जबा की शादी बचपन में हुई थी, क्योंकि उसी का नाम अमूल्य चक्रवर्ती है. उधर एक रात, छोटी बहू भूतनाथ से अपने पति के लिए प्रार्थना करने के लिए पास के एक मंदिर में अपने साथ चलने के लिए कहती है; बड़े जमींदार मझले बाबू उनकी बातचीत सुन लेते हैं और उन्हें संदेह होता है कि छोटी बहू का भूतनाथ के साथ गलत संबंध है, और अपने गुर्गों को उनका पीछा करने का आदेश देते हैं. भूतनाथ और छोटी बहू एक गाड़ी में यात्रा करते हैं, लेकिन मझले बाबू के गुर्गे उसे रोक देते हैं. भूतनाथ को बेहोश कर दिया जाता है और छोटी बहू का अपहरण कर लिया जाता है. जब वह अस्पताल में जागता है, तो बंसी भूतनाथ को बताता है कि छोटी बहू गायब हो गई है और उसका पति मर गया है. फ्लैशबैक समाप्त होता है. भूतनाथ के कर्मचारियों ने उसे सूचित किया कि हवेली के खंडहरों में एक कंकाल मिला है. लाश पर आभूषणों से भूतनाथ को एहसास हुआ कि यह छोटी बहू के अवशेष हैं. अंतिम दृश्य में, उदास भूतनाथ जबा, जो अब उसकी पत्नी है, के साथ एक गाड़ी में सवार होकर चला जाता है. फिल्म के इस त्रासद अंत को देखकर कई लोगों, जिसमें के आसिफ प्रमुख थे, ने गुरुदत्त को फिल्म का अंत बदलकर सुखांत करने की सलाह दी. हालांकि गुरुदत्त को फिल्म का अंत नहीं बदलना चाहते थे लेकिन मन ही मन उन्हें आशंका हुई कि फ़िल्म फ्लॉप हो गई तो क्या होगा? ‘काग़ज़ के फूल’ की नाकामी से उन्हें गहरा सदमा लगा था। ‘चौदहवीं का चाँद’ की अच्छी कमाई ने उस घाटे से उबरने में उनकी मदद की थी. गुरुदत्त एक बार फिर किसी तगड़े नुक़सान के ख़याल से थोड़ा डर गये. उधर के आसिफ़ कहने लगे कि अंत में दिखाओ कि छोटी बहू ने पीना छोड़ दिया, मियाँ बीवी में सुलह हो गयी और उनकी गृहस्थी में खुशियां लौट आईं. गुरुदत्त बहुत परेशान होकर लौटे. तमाम सिनेमाघरों में फ़ोन करके टिकट बिक्री का हालचाल लेते रहे. बॉक्स ऑफिस की रिपोर्ट संतोषजनक नहीं थी. सुबह उन्होंने फ़िल्म के निर्देशक और पटकथा लेखक अबरार अल्वी को तलब किया और बिमल मित्र की मौजूदगी में ही कहा कि फ़िल्म का अंत बदल दिया जाय। विमल मित्र ने कोई अपत्ति नहीं की पर अबरार से तीखी बहस हो गई. उधर मीना कुमारी को ख़बर भी कर दी गई कि फिर से शूटिंग होगी. तोड़ दिया जा चुका सेट दोबारा तैयार किया जाने लगा. पर इस सबके बीच गुरुदत्त के दिमाग में लगातार कशमकश चल रही थी. दिन भर गा़यब रहने के बाद अचानक लौटे और कहा- ”मैं फ़िल्म का अंत नहीं बदलूंगा. के. आसिफ़ चाहे जो कहे, मैं भी आख़िर डायरेक्टर हूँ, मुझमें भी बुद्धि विवेचना है. भले कोई मेरी फ़िल्म न देखें, मुझे लाखों लाख का गच्चा लगे तो लगे, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. यह फ़िल्म- इसका अंत बदलने लायक है ही नहीं. यह अलग क़िस्म की कहानी है. लोग अगर समझ सकें तो भला, अगर न समझें तो नुक़सान उनका है, मेरा नहीं.” और इस तरह छोटी बहू की त्रासदी सुखांतिकी में बदलने से बच गई.ये अलग बात है कि ”साहब बीवी और ग़ुलाम” न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर कामयाब रही बल्कि अवार्ड्स भी खूब मिले. मीना कुमारी ट्रेजेडी क्वीन के रूप में अमर हो गयी. सामंती परिवेश में एक महिला की दुखांत कहानी पर बनी इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार तो मिला ही , चार-चार फिल्मफेयर अवार्ड भी मिले थे.मीना कुमारी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए, अबरार अल्वी को निर्देशन के लिए, गुरुदत्त को बतौर निर्माता सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए और वी के मूर्ति को सिनेमेटोग्राफी के लिए. पर ऐसा नहीं है कि फिल्म का अंत में कोई छेड़-छाड़ नहीं की गयी. ये अलग बात है कि उससे कहानी की मूल आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। दरअसल भूतनाथ और जबा के संबंधों का विकास जिस सरल रैखिक रूप में फिल्म में हुआ है, वैसा उपन्यास में नहीं है. फिल्म में जबा और भूतनाथ के बीच उतरोतर प्रेम बढ़ता जाता है जिसकी परिणिति अंत में दोनों की शादी के रूप में होती है. पर उपन्यास में दोनों के संबंधों में काफी जटिलता है. भूतनाथ सुन्दर, चुलबुली और बुद्धिमती जबा के की स्वाभाविक रूप से आकर्षित होता है और प्यार भी करने लगता है। दूसरी ओर जबा भूतनाथ को एक हद तक पसंद भी करती है, पर अपनी शादी सुपवित्र से ठीक होने पर कोई ऐतराज नहीं करती है और बाद में उसे प्यार करने लगती है।
जब भूतनाथ ने बीमारी की अवस्था में उसके मुंह से सुपवित्र का नाम सुनता है तो वह उसी समय निश्चय कर लेता है कि वो इस बात को उसे कभी नहीं बताएगा कि वही अतुल्य चक्रवर्ती है. वह उसे कहता है कि उसने उसके गाँव जाकर पता लगा लिया है कि अतुल्य की मृत्यु हो चुकी है और उससे जोर देकर कहता है कि वो सुपवित्र से शादी कर ले. शायद ये अंत फिल्म में एक रोमांटिक जोड़ी को दिखाने के लिए किया गया होगा. वैसे भी उस समय गुरुदत्त और वहीदा की जोड़ी काफी लोकप्रिय थी। पर दुर्भाग्य से इसी फिल्म के निर्माण के दौरान उनके सम्बन्ध आपस में ख़राब हो गए और अंत में हालत ये हो गयी कि दोनों के बीच बोलचाल तक बंद हो गयी। बड़ी मुश्किल से वहीदा को अंतिम दृश्य के लिए मनाया गया था. अभिनय के मामले में मीना कुमारी पूरी फिल्म पर हावी रहती है. हालाँकि उनका प्रवेश फिल्म के शुरू होने के बाद कोई 50 मिनट के बाद ही होता है, पर सामंती बंदिशों में जकड़ी अपने पति के प्यार में डूबी और बाद में शराबी बन चुकी छोटी बहू की भूमिका को उन्होंने पर्दे पर जीवंत कर दिया है. शायद उन्हीं दिनों वे अपने निजी जीवन में भी पति के प्यार का अभाव था क्योंकि कमाल अमरोही उसे पैसा कमाऊ मशीन के रूप में ही देखते थे और ढेर सारी बंदिशें लगा रखी थी. कहते हैं मीना अपने इस किरदार में इतनी डूब गयी थी कि बाद के वर्षों में भी वो खुद भी शराब के नशे में डूब गयी और अंत में उसी शराब की लत ने उनकी जान ले ली. भूतनाथ के रूप में गुरु ने भी काफी बढ़िया अभिनय किया है. भूतनाथ को सरल और भोला-भला दिखने के लिए अबरार के कहने पर गुरुदत्त ने अपनी मूंछें मुड़वा ली थी। चूंकि वे तब तक निर्देशन छोड़ रखा था तो उनका पूरा ध्यान अभिनय पर था और वे भूतनाथ के पात्र को परदे साकार करने में सफल रहे. जबा की भूमिका में वहीदा बहुत सुन्दर दिखी हैं, खासकर ”भंवरा बड़ा नादाँ है…” गाने में उनकी शोखी और सुन्दरता देखती ही बनती है. मंझले बाबू और छोटे बाबू की भूमिका को सप्रू और रहमान कुछ इस तरह से साकार किया है कि लगता है वास्तविक अय्याश जमीदार परदे पर साकार हो गए हों. पर साथ ही उन्होंने उन भूमिकाओं को इतनी गरिमा से भर दिया है कि नकारात्मक चरित्र होने के बावजूद दर्शकों के मन में उनके लिए आक्रोश तो उमड़ता है, पर नफरत नहीं। अ
न्य भूमिकाओं में धूमल, नजीर हुसैन, हरिन्द्र चट्टोपाध्याय इत्यादि ने भी अच्छा अभिनय किया है। इस फिल्म का कोई भी चर्चा बिना इसके गीत-संगीत के जिक्र के अधूरा रहेगा. इस फिल्म में संगीत हेमंत दा ने दिया है और गीत के बोल लिखे हैं शकील बदायुनी ने.फिल्म के सभी गीत एक से बढ़कर एक हैं. ”चले आओ….”, ”पिया ऐसो जिया में…”, ”ना जाओ सैयां छुड़ा के बैंया…”( सभी गीता दत्त), ”मेरी जान ओ मेरी जान…”,”भंवरा बड़ा नादान हाय…”, ”साक़िया आज मुझे नींद ….”, ”मेरी बात रही मेरे मन…”( सभी आशा भोंसले), साहिल की तरफ कश्ती…( हेमंत कुमार) जैसे गीत कर्णप्रिय तो हैं पर साथ ही अर्थपूर्ण हैं और कहानी को आगे बढ़ाते हैं. अपने-अपने पति के प्यार को तरसती मीना कुमारी और गायिका गीता दत्त ने छोटी बहू द्वारा गए गानों में जान भर दी है. ”न जाओ सैंया…” में गीता के गले का दर्द और परदे पर मीना कुमारी के चेहरे का दर्द और मायूसी देखते ही बनती है. हालाँकि फिल्म का निर्देशन अबरार ने किया है, पर गानों के फिल्मांकन का जिम्मा गुरु ने अपने ऊपर ही रखा और सभी गानों का निर्देशन उन्होंने ने ही किया. यही कारण है कि अधिकांश लोग आज भी इस फिल्म का वास्तविक निर्देशक गुरुदत्त को ही मानते हैं. इस चलते अबरार अल्वी अपने अंतिम समय तक लोगों को विश्वास दिलाने का प्रयास करते रहे कि फिल्म का निर्देशन वाकई उन्होंने किया है. इसमें कोई दो मत नहीं है कि फिल्म का निर्देशन अबरार अल्वी ने काफी अच्छा किया है।
पर कथानक की पृष्ठभूमि के साथ वो उतना न्याय नहीं कर पाए जितना कि इसी उपन्यास पर बनी बांगला फिल्म में किया गया है. जिस तरह उपन्यास के पन्ने-पन्ने पर 19 वीं सदी के अंतिम दशक और 20 वीं सदी के पहले दशक का वातावरण समाया हुआ है, वैसा फिल्म में नहीं है. फिल्म एक तरह से भूतनाथ और उसके दो असाधारण महिलाओं, जिसमें की एक टूटते सामंती बेड़ियों में जकड़ी हुई है तो दूरी नवजागरण की आवोहवा में पली बढ़ी है, के साथ के संबंधों पर ही मुख्यतः केन्द्रित होकर रह जाती है. इस खामी के बावजूद ये पीरियड ड्रामा गुरुदत्त के दो अन्य कालजयी फिल्मों ”प्यासा” और ”कागज के फूल” से किसी भी मायने में कम नहीं, बल्कि उनके समकक्ष है। आज गुरुदत्त अपने इन्हीं तीन फिल्मों ”प्यासा”, ”कागज के फूल” और ”साहब, बीवी और गुलाम” के चलते सर्वकालिक श्रेष्ठ भारतीय फिल्मकारों की सूची में शामिल हैं।