नई दिल्ली। “दौलत इंसान की ज़रूरत होती है। लेकिन अगर ये कमज़ोरी बन तो मुसीबत भी बन जाती है।” ये डायलॉग कादर खान ने इस फिल्म में बोला था। दौलत की जंग। जो रिलीज़ हुई थी आज से ठीक 33 साल पहले। यानि 3 जनवरी 1992 को। बहुत अच्छी फिल्म है। ये उन दो फिल्मों में से एक है जिसमें कादर खान और आमिर खान ने साथ काम किया था। दूसरी थी जवानी ज़िंदाबाद जो 17 अगस्त 1990 को रिलीज़ हुई थी।
इस फिल्म में शफी ईनामदार और टीकू तल्सानिया भी थे और ज़बरदस्त एक्टिंग उन दोनों ने इस फिल्म में की थी। जबकी कादर खान का रोल भी शानदार था। ये फिल्म एस.ए.कादर ने डायरेक्ट की थी। प्रोड्यूसर थे जलिल अहमद। संगीत दिया था इस फिल्म में आनंद-मिलिंद ने। सभी गीत लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरी ने। फिल्म के अन्य प्रमुख कलाकार थे परेश रावल, दलीप ताहिल, किरण कुमार, विजू खोटे, जूनियर महमूद, बी.एम.व्यास और राम सेठी।
इस फ़िल्म की कहानी राजेश और आशा नाम के दो नौजवानों की है जो एक ही कॉलेज में पढ़ते हैं। उन दोनों के पिता बिजनेस राइवल हैं। एक-दूजे को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते। लेकिन आशा और राजेश को आपस में इश्क हो जाता है। और चूंकि उन्हें पता है कि उन दोनों के बाप उनके इश्क को परवान चढ़ने ही नहीं देंगे, तो दोनों घर से भाग जाते हैं। लेकिन फिर इन दोनों का सामना कुछ ऐसे गिरोहों से होता है जो किसी खजाने की तलाश में हैं।
एक व्यक्ति राजेश को खजाने का नक्शा देता है। लेकिन राजेश उसे अच्छे से याद करके चबा जाता है। राजेश की मैमोरी बहुत तेज़ है। नक्शा चबा जाने बाद भी उसे सबकुछ अच्छी तरह से याद है। लेकिन परेशानी तब होती है जब उस नक्शे की तलाश में लगा गुंडों का एक गिरोह राजेश तक पहुंच जाता है। पहले तो राजेश को वो गिरोह नक्शा देने के लिए धमकाता है। फिर जब गिरोह को यकीन हो जाता है कि नक्शा अब राजेश के दिमाग में है, तो गिरोह उसे अपने साथ रख लेता है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, एक और गिरोह व कुछ अन्य किरदार भी फ़िल्म में आते रहते हैं। और फ़िल्म रोचक होती चली जाती है। कादर खान की एंट्री इस फ़िल्म में बहुत बढ़िया है। वो एक ऐसे संदूक से बाहर निकलते हैं जिसे जंगल में एक गधा खींच रहा होता है। यूट्यूब पर ये फ़िल्म मौजूद है। इसके कमेंट सेक्शन में बहुत लोग कहते दिखते हैं कि फ़िल्म बढ़िया है। मगर बॉक्स ऑफ़िस पर ये फ़िल्म फ्लॉप साबित हुई थी। हो सकता है इस फ़िल्म पर भी पायरेसी की गाज गिरी हो।