सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि रामनाथ गोयनका साहित्य सम्मान साहित्य, विचारों और निडर अभिव्यक्ति की स्थायी शक्ति का उत्सव मनाता है।
श्री राम नाथ गोयनका को श्रद्धांजलि देते हुए उपराष्ट्रपति ने उन्हें निडर पत्रकारिता की महान हस्ती बताया, जिन्होंने ईमानदारी, बौद्धिक साहस और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखा। उपराष्ट्रपति ने उन्हें ‘भारतीय लोकतंत्र का विवेक रक्षक’ कहा, जिनकी विरासत पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है।
श्री जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति के दौर से अपने व्यक्तिगत जुड़ाव को स्मरण करते हुए श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि इमरजेंसी के दौरान श्री राम नाथ गोयनका ने पत्रकारिता के मूल्यों को बनाए रखा और बिना किसी डर के प्रेस सेंसरशिप का विरोध किया। उन्होंने इमरजेंसी के दौरान प्रकाशित प्रतिष्ठित खाली संपादकीय को मौन की शक्ति और पत्रकारिता की नैतिक शक्ति के शक्तिशाली प्रदर्शन के रूप में उजागर किया।
उपराष्ट्रपति ने समाचार पत्रों से राष्ट्रीय विकास के मुद्दों को अधिक स्थान देने का आह्वान किया। उपराष्ट्रपति ने सुझाव दिया कि नियमित रूप से कम से कम दो पृष्ठ रचनात्मक चर्चा के लिए समर्पित किए जाएं जो राष्ट्रीय चेतना और नागरिकों को सूचित करके की प्रक्रिया को मजबूत करे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब सच्चाई को दृढ़ विश्वास के साथ कायम रखा जाता है, तो उसमें अपनी नैतिक शक्ति होती है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के विजन का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत की प्रगति समावेशी होनी चाहिए, जिसमें सभी भाषाएं और सांस्कृतिक परंपराएं एक साथ आगे बढ़ें। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक, भाषाई और बौद्धिक विरासत को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में रखने में प्रधानमंत्री के नेतृत्व को स्वीकार किया। उपराष्ट्रपति ने भारतीय भाषाओं और परंपराओं को बढ़ावा देने की विभिन्न पहल का जिक्र किया, जिसमें मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देना शामिल है। संस्कृति मंत्रालय के ज्ञान भारतम मिशन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह पहल डिजिटल और एआई-संचालित उपकरणों के माध्यम से भारत की पांडुलिपियों और ज्ञान प्रणालियों को संरक्षित करने के लिए परंपरा को प्रौद्योगिकी के साथ एकीकृत करती है।
श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा कि साहित्य हमेशा समाज के दर्पण और सभ्यतागत मूल्यों के मशाल वाहक के रूप में काम करता रहा है, ऐसे में तेजी से हो रहे आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक बदलाव के दौर में, लेखकों और बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनकी भूमिका रचनात्मकता से आगे बढ़कर सामाजिक सद्भाव, संवैधानिक मूल्यों और नैतिक चर्चा को बढ़ावा देने तक फैली हुई है। उन्होंने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आधारशिला बनी हुई है और यह तब सबसे अच्छी तरह फलती-फूलती है जब इसे जिम्मेदारी, सहानुभूति और जवाबदेही के साथ उपयोग किया जाता है।
वेदों और उपनिषदों से लेकर महाकाव्यों, भक्ति और सूफी कविता और आधुनिक साहित्य तक भारत की समृद्ध साहित्यिक विरासत का जिक्र करते हुए, उन्होंने कहा कि बहुलता, बहस और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के प्रति सम्मान भारत की सभ्यतागत भावना में गहराई से निहित है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि विकसित भारत को न केवल आर्थिक ताकत और तकनीकी प्रगति से, बल्कि सामाजिक समावेश, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और नैतिक मूल्यों से भी परिभाषित किया जाता है। यह देखते हुए विकसित भारत की यात्रा के लिए प्रबुद्ध दिमाग, रचनात्मक अभिव्यक्ति और मजबूत नैतिक दिशा की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि साहित्य और पत्रकारिता सूचित बहस, रचनात्मक असहमति और लोकतांत्रिक सतर्कता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पुरस्कार विजेताओं को बधाई देते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि उनके योगदान भारत के बौद्धिक परिदृश्य को समृद्ध करते हैं और विचारों और समाज के बीच बंधन को मजबूत करते हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि उनकी रचनाएँ पाठकों, विशेष रूप से युवा पीढ़ी को, गहराई से सोचने, जिम्मेदारी से कार्य करने और दुनिया के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ने के लिए प्रेरित करेंगी।
इस कार्यक्रम में, प्रख्यात कन्नड़ लेखक और भारत की सबसे सम्मानित साहित्यिक हस्तियों में से एक डॉ. चंद्रशेखर कंबारा, को लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया। सर्वश्रेष्ठ फिक्शन पुरस्कार अरुणाचल प्रदेश की सुबी ताबा को; सर्वश्रेष्ठ नॉन-फिक्शन पुरस्कार शुभांशी चक्रवर्ती को; और सर्वश्रेष्ठ डेब्यू पुरस्कार नेहा दीक्षित को प्रदान किया गया।