नई दिल्ली। नमकीन उन फ़िल्मों में है जो कहानी नहीं सुनाती, ज़िंदगी की थकान दिखाती है। यह फ़िल्म चार औरतों और एक पुरुष के इर्द-गिर्द घूमती है, लेकिन असल में यह रिश्तों की बेबसी, ग़रीबी की चोट और मां की लाचारी की कहानी है। फिल्म यहां किसी को दोषी नहीं ठहराती, बस हालात को सामने रख देती हैं। वहीदा रहमान (जुगनी (मां) इस फ़िल्म का सबसे अहम, सबसे भारी और सबसे दर्दनाक किरदार जुगनी का है।
वहीदा रहमान ने यहां मां को नहीं, एक हारी हुई औरत को जिया है। जुगनी एक ऐसी मां है जो अपनी बेटियों से बहुत प्यार करती है, लेकिन उन्हें बचा नहीं पाती। उसकी लाचारी सबसे ज़्यादा तब चुभती है जब वह ग़लत को ग़लत जानते हुए भी चुप रहती है क्योंकि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। वहीदा रहमान की आंखों में हर समय डर, अपराधबोध और ममता एक साथ रहते हैं। वह जानती है कि उसकी बेटियां धीरे-धीरे टूट रही हैं, फिर भी वह उन्हें जोड़ नहीं पाती। जुगनी इस फ़िल्म की आत्मा है और उसकी हार, पूरे समाज की हार लगती है। शर्मिला टैगोर (निमकी) निमकी सबसे बड़ी बहन है संभली हुई, थकी हुई और ज़िम्मेदारियों से झुकी हुई। शर्मिला टैगोर ने निमकी को बहुत सादगी से निभाया है। वह ज़ोर से रोती नहीं, शिकायत नहीं करती, बस हालात को ढोती चली जाती है। निमकी अपने हिस्से की ज़िंदगी छोड़कर मां और बहनों की ढाल बन जाती है। उसका प्रेम भी अधूरा है, इच्छाएं भी दबा दी गई हैं।
र्मिला की आंखों में जो चुप स्वीकार है, वही इस किरदार की सबसे बड़ी पीड़ा है। शबाना आज़मी (मिट्ठू) मिट्ठू इस फ़िल्म की सबसे तीखी आवाज़ है।(बिन आवाज) वह बग़ावत करती है, सवाल पूछती है, ताने मारती है और कटु हो जाती है। लेकिन उसकी कड़वाहट का कारण उसका स्वभाव नहीं, उसका दर्द है। शबाना आज़मी मिट्ठू को कहीं भी अच्छा बनाने की कोशिश नहीं करतीं और यही उनकी ताक़त है। वह वह औरत है जो टूटने से पहले खुद को कठोर बना लेती है। जब पीड़ा साधना बन जाती है तो इंसान किसी और से नहीं, अपने ही बनाए भ्रमों से बाहर निकल आता है। छोटी बहन (चिनकी) चिनकी इस फ़िल्म का सबसे मासूम लेकिन सबसे त्रासद किरदार है।वह अभी समझ नहीं पाई है कि दुनिया कितनी बेरहम है। घर का घुटन भरा माहौल, गरीबी, मां की बेबसी सब उसे अंदर ही अंदर तोड़ देता है। चिंकी का घर से भाग जाना कोई नाटकीय घटना नहीं, बल्कि एक मजबूरी है। वह भागती नहीं, बचने की कोशिश करती है। उसका जाना इस बात का सबूत है कि जब घर सुरक्षित न रहे, तो बच्चे रास्तों पर भरोसा कर लेते हैं। संजीव कुमार (गेरूलाल) संजीव कुमार का किरदार कमजोर है, लेकिन संवेदनशील है। वह इस घर में एक बाहरी इंसान होकर भी इन औरतों के दर्द को महसूस करता है। उसका होना जैसे पूरे घर की हालत का प्रतीक बन जाती है सब कुछ भीतर से गलता हुआ। नमकीन किसी खलनायक की फ़िल्म नहीं है।
यह उन ज़िंदगियों की कहानी है जहां हर कोई मजबूर है मां इसलिए चुप है क्योंकि वह मां है, बहन इसलिए झुकी है क्योंकि घर चलाना है, दूसरी बहन इसलिए कड़वी है क्योंकि उसे प्यार नहीं मिला, और सबसे छोटी इसलिए भागती है क्योंकि वह डर गई है। संगीत और खामोशी आर. डी. बर्मन का संगीत यहां गीत नहीं, सांसों की तरह बहता है। जैसे गीत इस फ़िल्म की उदासी को आवाज़ देते हैं। नमकीन एक कठोर लेकिन सच्ची फ़िल्म है। यह बताती है कि हर मां बचा नहीं पाती, हर बहन सह नहीं पाती और हर बच्चा समझदार नहीं बन पाता। हम अकसर ठीक हो जाने को दर्द के ख़त्म होने से जोड़ देते हैं, जबकि असल में होता यह है कि दर्द हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है। वह हर सुबह हमारे साथ उठता है, हर रात हमारे साथ सोता है, बस समय के साथ उसकी आवाज़ धीमी हो जाती है। और जब दर्द चिल्लाना बंद कर देता है, तब हम मान लेते हैं कि सब ठीक हो गया।